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आपको सवाल से पुर्व यह जानना जरूरी है कि घुसपैठिया का मतलब क्या होता है,जिस समय चिस्ती भारत आये थे उस समय दिल्ली पर मुस्लिम शाशको का शासन था।तो घुसपैठ का कोई सवाल ही नही उठता ।ये बात अलग थी उनका उद्देश्य अपने धर्म का प्रचार प्रसार करना था।

रवि जादौन की प्रोफाइल फ़ोटो

अगर ग़द्दारी की बात है तो जयचंद्र और राघव चेतन दोनों का नाम आना ज़रूरी है । पहला जयचंद्र जिसकी गद्दारी के कारण ना सिर्फ पृथ्वीराज चौहान को हारना पड़ा बल्कि उसने ही इस्लामिक आक्रमणकारियों को भारत का रास्ता दिखाया था ।

दूसरा राघव चेतन जिसकी ग़द्दारी के कारण चित्तौड़गढ़ राज्य की वीर रानी पद्मावती समेत हजारों राजपूताना स्त्रियों को जौहर की आग में अपने आप को समर्पित करना पड़ा।

1) जयचंद

जब-जब इतिहास के पन्नों में राजा पृथ्वीराज चौहान का नाम लिया जाता है, तब-तब उनके नाम के साथ एक नाम और जुड़ता है, वो नाम है जयचंद। किसी भी धोखेबाज, गद्दार या देश द्रोही के लिए जयचंद का नाम तो मानो मुहावरे की तरह प्रयोग किया जाता है.

साथ ही जयचंद को लेकर तो एक मुहावरा खूब चर्चित है कि. "जयचंद तुने देश को बर्बाद कर दिया गैरों को लाकर हिंद में आबाद कर दिया."

जयचंद ने दिल्ली की सत्ता के लालच में मोहम्मद गौरी का साथ दिया और युद्ध में गौरी को अपनी सेना देकर पृथ्वीराज को हरा दिया. मगर युद्ध जीतने के बाद गौरी ने राजा जयचंद को भी मार दिया और उसके बाद गौरी ने कन्नौज और दिल्ली समेत कई अन्य राज्यों पर कब्जा कर लिया। जयचंद ने सिर्फ पृथ्वी राज को ही धोखा नहीं दिया बल्कि समस्त भारत को धोखा दिया क्यूंकि गौरी के बाद देश में इस्लामिक आक्रमणकारी हावी होते चले गये थे।

दिल्ली पर शासन करने वाले आखिरी हिन्दू शासक पृथ्वीराज चौहान के नाम से कौन वाकिफ नहीं है। पृथ्वीराज एक ऐसे वीर योद्धा थे जिन्होंने बचपन में ही अपने हाथों से शेर का जबड़ा फाड़ दिया था। इतना ही नहीं आंखें ना होने के बावजूद अपने परमशत्रु मोहम्मद गोरी को मौत के घाट उतार दिया था।

जयचंद पर आरोप है कि उसनें गौरी को पृथ्वीराज पर आक्रमण करने हेतु बुलाया और सैनिक सहायता दी। जयचन्द कन्नौज साम्राज्य के राजा थे। वो गहरवार राजवंश से थे जिसे अब राठौड़ राजवंश के नाम से जाना जाता है।

दरअसल पृथ्वीराज और जयचंद की पुरानी दुश्मनी थी, दोनों के मध्य युद्ध भी हो चुके थे फिर भी पृथ्वीराज द्वारा संयोगिता से शादी के बाद वह जयचंद का दामाद बन चुका था।

पृथ्वीराज चौहान का राजकुमारी संयोगिता का हरण करके कन्नौज से ले जाना राजा जयचंद को कांटे की तरह चुभ रहा था। उसके दिल में अपमान के तीखे तीर से चुभ रहे थे। वह किसी भी कीमत पर पृथ्वीराज का विनाश चाहता था। भले ही उसे कुछ भी करना पड़े।

अपने जासुसों से उसे पता चला की मुहम्मद गौरी पृथ्वीराज से अपनी पराजय का बदला लेना चाहता है। बस फिर क्या था जयचंद को मनो अपने मन की मुराद मिल गयी। उसने गौरी की सहायता करके पृथ्वीराज को समाप्त करने का मन बनाया। जयचंद अकेले पृथ्वीराज से युद्ध करने का साहस नहीं कर सकता था। उसने सोचा इस तरह पृथ्वीराज भी समाप्त हो जायेगा और दिल्ली का राज्य उसको पुरस्कार सवरूप दे दिया जायेगा।

राजा जयचंद के देशद्रोह का परिणाम यह हुआ की जो मुहम्मद गौरी तराइन के प्रथम युद्ध में अपनी हार को भुला नहीं पाया था, वह फिर पृथ्वीराज का मुकाबला करने के षड़यंत्र रचने लगा।

राजा जयचंद ने दूत भेजकर गौरी को पृथ्वीराज के खिलाफ सैन्य सहायता देने का आश्वासन दिया। देशद्रोही जयचंद की सहायता पाकर गौरी तुरंत पृथ्वीराज से बदला लेने के लिए तैयार हो गया। जब पृथ्वीराज को ये सुचना मिली की गौरी एक बार फिर युद्ध की तैयारियों में जुटा हुआ तो उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। मुहम्मद गौरी की सेना से मुकाबल करने के लिए पृथ्वीराज के मित्र और राज कवि चंदबरदाई ने अनेक राजपूत राजाओ से सैन्य सहायता का अनुरोध किया परन्तु संयोगिता के हरण के कारण से राजपूत राजा पृथ्वीराज के विरोधी बन चुके थे वे कन्नौज राजा के संकेत पर गौरी के पक्ष में युद्ध करने के लिए तैयार हो गए।

1192 ई० में एक बार फिर पृथ्वीराज और गौरी की सेना तराइन के क्षेत्र में युद्ध के लिए आमने सामने खड़ी थी। दोनों और से भीषण युद्ध शुरू हो गया। इस युद्ध में पृथ्वीराज की और से 3 लाख सेनिकों ने भाग लिया था जबकि गौरी के पास एक लाख बीस हजार सैनिक थे। गौरी की सेना की विशेष बात ये थी की उसके पास शक्तिशाली घुड़सवार दस्ता था।

पृथ्वीराज ने बड़ी ही आक्रामकता से गौरी की सेना पर आक्रमण किया। उस समय भारतीय सेना में हाथी के द्वारा सैन्य प्रयोग किया जाता था। गौरी के घुड़सवारो ने आगे बढकर राजपूत सेना के हाथियों को घेर लिया और उनपर तीर वर्षा शुरू कर दी।

घायल हाथी न तो आगे बढ़ पाए और न पीछे बल्कि उन्होंने घबरा कर अपनी ही सेना को रोंदना शुर कर दिया। तराइन के द्वितीय युद्ध की सबसे बड़ी त्रासदी यह थी की देशद्रोही जयचंद के संकेत पर राजपूत सैनिक अपने राजपूत भाइयो को मार रहे थे। दूसरा पृथ्वीराज की सेना रात के समय आक्रमण नहीं करती थी (यही नियम महाभारत के युद्ध में भी था) लेकिन तुर्क सैनिक रात को भी आकर्मण करके मारकाट मचा रहे थे।

परिणामस्वरूप इस युद्ध में पृथ्वीराज की हार हुई और उसको तथा राज कवि चंदबरदाई को बंदी बना लिया गया। देशद्रोही जयचंद का इससे भी बुरा हाल हुआ, उसको मार कर कन्नौज पर अधिकार कर लिया गया। पृथ्वीराज की हार से गौरी का दिल्ली, कन्नौज, अजमेर, पंजाब और सम्पूर्ण भारतवर्ष पर अधिकार हो गया। भारत मे इस्लामी राज्य स्थापित हो गया। अपने योग्य सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक को भारत का गवर्नर बना कर गौरी, पृथ्वीराज और चंदबरदाई को युध्बन्धी के रूप में अपने गृह राज्य गौरी की और रवाना हो गया।

2) राघव चेतन

मलिक मोहम्मद जायसी के रूपक काव्य 'पद्मावत' की माने तो चित्तौड़गढ़ की बर्बादी की कहानी चेतन तांत्रिक से शुरू होती है। जिसका असल नाम राघव चेतन था।

रावल रतन सिंह (1302-1303 ई.) मेवाड़ के शासक थे, जिसकी राजधानी चित्तौड़ थी। रावल रतन सिंह का विवाह रानी पद्मावती के साथ हुआ था। रानी पद्मावती अपूर्व सुन्दर थी। उसकी सुन्दरता की ख्याति दूर-दूर तक फैली थी।

राघव चेतन महाराजा रतन सिंह का राजपुरोहित बनना चाहता था। वो पंडित होने के साथ- साथ तंत्र मंत्र का साधक भी था। वह अक्सर विभिन्न तांत्रिक क्रियाओं में लिप्त रहता था। इससे पंडितों के साथ राजा रतनसेन भी खासे नाराज हुए। वह तंत्र विद्या के सख्त विरोधी थे। उन्होंने राघव चेतन को सजा देते हुए काला मुंह करते हुए उसे गधे पर बिठाया और राज्य से बाहर निकाल दिया।

राजा रतन सिंह को क्या पता था कि जिस चेतन को वह सजा दे रहे हैं, वही उनकी बर्बादी की वजह बनेगा । अब उसे ऐसे शख्स की तलाश थी जो चित्तौड़ के किले को तबाह कर दे। उसकी तलाश ख़त्म हुई दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी पर ।

चित्तौड़ से निकाले जाने के बाद राघव चेतन ने दिल्ली में पनाह ली। जल्दी ही अपनी तंत्र विद्या से उसने खिलजी पर जादू कर दिया। वह दिल्ली के सुल्तान का खास बन गया। उसने विशाल किले, सोने से भरे मंदिरों, उर्वर ज़मीन और बड़ी संपदा का लालच देते हुए खिलजी को उकसाना शुरू किया।

जब उसने खिलजी के सामने रानी पद्मावती के रूप का बखान किया तो उसका तीर निशाने पर लगा।

खिलजी ने यह फैसला कर लिया था कि वह कैसे भी रानी पद्मावती को हासिल करके रहेगा और इसके लिए उसने चित्तौड़गढ़ पर चढ़ाई करने का फैसला किया ।

कई महीनों की घेराबंदी के बाद भी जब अलाउद्दीन खिलजी किले पर फतेह ना कर पाया तो उसने छल किया। श्रुति यह है कि उसने दर्पण में रानी की प्रतिबिंब देखा था और उसके सम्मोहित करने वाले सौंदर्य को देखकर अभिभूत हो गया था। महाराजा रतन सिंह को बंदी बना लिया और अपने साथ दिल्ली ले गया।

जिसके बाद रानी पद्मावती मैं अपनी सूझबूझ से महाराजा रतन सिंह को अलाउद्दीन की कैद से छुड़ा लिया। और साथ ही राघव चेतन को भी मौत के घाट उतार दिया।

जब खिलजी ने चित्तौड़गढ़ पर दोबारा हमला किया तो राजपूती सेना ने उसकी सेना का डटकर मुकाबला किया पर अंत में जो ऐसा लगा कि शायद राजपूत ये युद्ध नहीं जीत पाएंगे । तो रानी पद्मावती ने उसकी बुरी नजर से बचने के लिए खुद को अग्नि के हवाले कर लिया। खिलजी रानी को छू भी नहीं पाया।

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जाहिर है कि न राघव चेतन नाम का ये तांत्रिक दिल्ली के सुल्तान को उकसाता और न ये हमला होता। इतिहास में इस तांत्रिक की जगह खलनायक की तरह है, जिससे आज भी राजस्थान में घृणा की जाती है।

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1540 में जायसी द्वारा लिखे गए इस ग्रंथ " पद्मावत " को इतिहासकार ऐतिहासिक महत्व का नहीं मानते या फिर इसे लेकर उनमें मतभेद है इसलिए रानी पद्मिनी एक किस्से की तरह इतिहास में हैं ।

इतिहासकार डॉ. ओझा ( उदयपुर का इतिहास ) मानते है कि " इतिहास के अभाव में लोगों ने पद्मावत को ऐतिहासिक पुस्तक मान लिया है परंतु वास्तव में वह आजकल के ऐतिहासिक उपन्यासों की सी कविताबद्ध रचना है " । कुछ ऐसा ही मत डॉ लाल ( खिलजी वंश का इतिहास ) का है ।

अपनी पुस्तक के अंत में जायसी कहता है कि " इस कथा में चित्तौड़ देह का , राजा रतनसिंह मस्तिष्क का , सिंहलद्वीप ह्रदय का , पद्मिनी चातुर्य का और सुल्तान अलाउद्दीन माया का प्रतिरूप

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श्रीमान आपका प्रश्न बिल्कुल बेबुनियाद है। जहाँ तक मुझे लग रहा है की आपने यह प्रश्न न्यूज़ १८ इण्डिया के रिपोर्टर अमिश देवगन के डिबेट शो आर या पार में ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती पर दिए गए टिप्पणी से प्रेरित होकर दिया है जिससे आपका प्रश्न प्रसिद्ध हो सके। इतने बड़े सूफी संत के बारे में आपने ऐसा प्रश्न किया जो बिल्कुल ही तार्किक नहीं है।

(स्त्रोत भारतकोश)

यह माना जाता है कि ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती सन 1195 ई में मदीना से भारत आए थे। वे ऐसे समय में भारत आए, जब मुहम्मद ग़ोरी की फौज अजमेर के राजपूत राजा पृथ्वीराज चौहान से पराजित होकर वापस ग़ज़नी की ओर भाग रही थी। भागती हुई सेना के सिपाहियों ने ख़्वाजा म

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अजमेर शरीफ दरगाह, सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती (ग़रीब नवाज़-गरीब के ग़रीब) के नाम से जानी जाने वाली दरगाह अजमेर शरीफ़ दरगाह मुख्य मध्य अजमेर रेलवे स्टेशन से 2 किलोमीटर (1.2 मील) दूर है और पैदल ही स्थित है। तारागढ़ पहाड़ी, और कई सफेद संगमरमर की इमारतों में दो आंगनों की व्यवस्था है, जिसमें हैदराबाद के निज़ाम द्वारा दान किया गया विशाल द्वार और मुग़ल बादशाह शाहजहाँ द्वारा निर्मित अकबरी मस्जिद भी शामिल है। इसमें संत की गुंबददार कब्र है।

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